आज़ादी मिली… मगर किस कीमत पर

“वो भारत, जिसका सपना था कि हर पेट भरा हो और हर घर में रोशनी जले, आज भी दो हिस्सों में बंटा है—एक हि

79वां स्वतंत्रता दिवस: 78 साल बाद भी भारत के सामने गंभीर चुनौतियां

“देशवासियों, 15 अगस्त 2025 को भारत अपना 79वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। आज़ादी के 78 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन कई मोर्चों पर चुनौतियां जस की तस बनी हुई हैं। आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दे देश की रफ्तार को थामे हुए हैं। आइए नज़र डालते हैं असली तस्वीर पर—”

 आर्थिक असमानता

“भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन अमीर-गरीब की खाई लगातार गहरी हो रही है। महानगरों में आलीशान जीवन के साथ ही गांवों में आज भी लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।”स्सा जहां ऊँची-ऊँची इमारतें और चमचमाती गाड़ियां हैं, और दूसरा हिस्सा जहां किसान कर्ज़ से टूटा है, मजदूर रोज़ की रोटी के लिए तरस रहा है।”

बेरोज़गारी और शिक्षा

“उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद युवाओं को रोज़गार नहीं मिल रहा। बाल श्रम अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और छोटे शहरों व गांवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी सबसे बड़ी बाधा है।”

छोटे शहरों और गांवों में बच्चों के हाथों में किताब की जगह मजदूरी के औज़ार हैं। ये तस्वीर आज़ादी के सपनों से बहुत अलग है।”

इंफ्रास्ट्रक्चर की कमजोरियां

 

“कई राज्यों में सड़क, स्वास्थ्य और ड्रेनेज जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं पिछड़ी हुई हैं। हर साल मानसून के दौरान बाढ़ और पानी निकासी की समस्या दोहराई जाती है, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।”

आज भी बारिश आते ही सड़कें तालाब बन जाती हैं, गांवों तक सही इलाज नहीं पहुँच पाता, और लोग मामूली बीमारियों से जान गंवा देते हैं। ये वो सच्चाई है, जिसे हम हर साल देख कर भी भूल जाते हैं।”

 

 सामाजिक मुद्दे

“लिंग असमानता, जातीय भेदभाव और धार्मिक तनाव आज भी समाज में मौजूद हैं। सामाजिक एकता और सामंजस्य बनाए रखना अब भी एक कठिन चुनौती है।”

आज़ादी का मतलब बराबरी था—लेकिन जात, धर्म और लिंग के नाम पर भेदभाव अब भी जिंदा है। जब तक हर नागरिक को सम्मान और बराबरी नहीं मिलेगी, तब तक ये आज़ादी अधूरी है।”

पर्यावरण और वन्यजीव संकट

“प्रदूषण, जंगलों की कटाई और जल संकट हमारे पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कई वन्यजीव अपने आवास खो रहे हैं, और शिकार व सड़क हादसे लुप्तप्राय प्रजातियां  के लिए खतरा बने हुए हैं। वहीं, आवारा पशु भी रोज़ खतरों से जूझ रहे हैं।”

“हमने अपने जंगल काट दिए, नदियां गंदी कर दीं, और हवा में जहर घोल दिया। नतीजा ये है कि न इंसान सुरक्षित है, न जानवर। वो धरती, जिसके लिए लड़कर आज़ादी ली थी, अब हमारी खुद की लापरवाही से दम तोड़ रही है।”

“आज का दिन सिर्फ़ जश्न का नहीं, बल्कि आईना देखने का है। हमें याद रखना होगा कि आज़ादी सिर्फ़ अंग्रेज़ों से मिली थी, लेकिन गरीबी, भेदभाव, और अन्याय से लड़ाई अभी जारी है। असली आज़ादी तब होगी, जब देश का हर बच्चा मुस्कुराते हुए स्कूल जाएगा, हर किसान फसल काटते वक्त गर्व महसूस करेगा, और हर इंसान बिना डर और भेदभाव के जी पाएगा।”

Add a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *