ग्रेटर नोएडा में निक्की भाटी की संदिग्ध मौत ने समाज और कानून दोनों के सामने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। परिवार का आरोप है कि निखी को वर्षों से ₹36 लाख की अतिरिक्त दहेज मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया और अंततः उसने अपनी जान गंवा दी। लेकिन शादी को नौ साल बीत जाने के कारण अब मामला सीधे तौर पर “दहेज हत्या” की परिभाषा में नहीं आ रहा।
कानून और उसकी सीमा
सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता अंकित सिंह की राय
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अंकित सिंह द्वारा ई-मेल advsinghlaw.22@gmail.com में दी गई राय में उनका कहना है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 304-B और भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 के तहत दहेज हत्या का मामला तभी बनता है जब शादी के सात साल के भीतर महिला की असामान्य परिस्थितियों में मौत हो और यह साबित हो जाए कि उस पर दहेज के लिए उत्पीड़न हुआ था। इन मामलों में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 भी लागू होती है, जिसके तहत “presumption of innocence” (निर्दोष मानने का सिद्धांत) उलटकर सबूत का बोझ आरोपी पर चला जाता है। यह प्रावधान आम अपराध मामलों से बिल्कुल अलग है और पीड़िता को विशेष सुरक्षा देता है। लेकिन सात साल के बाद इस तरह होने वाले अत्याचार और घटनाओं के बाद, पीड़ित परिवारों को इन प्रावधानों का लाभ न मिल पाना उनके लिए न्याय प्राप्त करने में बड़ी बाधा एवं गंभीर चुनौती है।
लेकिन निक्की भाटी के मामले में, क्योंकि शादी को नौ साल हो चुके थे, यह विशेष सुरक्षा लागू नहीं हो पा रही। अब पुलिस के पास विकल्प है कि या तो हत्या (IPC 302) का केस बनाए, जिसमें सज़ा उम्रकैद या फांसी तक हो सकती है, या फिर आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC 306) का मामला दर्ज करे, जिसमें अधिकतम 10 साल की सज़ा है।
“सात साल” की सीमा क्यों?
यह सीमा विधायिका ने एक सोच-समझकर बनाई थी। माना गया कि शादी के शुरुआती वर्षों में दहेज का दबाव सबसे ज़्यादा होता है और इसलिए उन्हीं वर्षों को क़ानूनी सुरक्षा दी गई। लेकिन व्यावहारिक रूप से यह हमेशा सच नहीं है। सवाल यह है कि क्या सात साल के बाद दहेज की मांग या प्रताड़ना बंद हो जाती है? यह सोचना गलत है कि सात साल बाद दहेज का ख़तरा ख़त्म हो जाता है। ऐसे मामलों में कानून को पीड़िता के पूरे जीवनकाल तक लागू होना चाहिए।”
न्याय या अन्याय?
कानून और ज़मीनी सच्चाई में यही सबसे बड़ा टकराव है। एक महिला यदि सात साल बाद भी दहेज की वजह से प्रताड़ित होकर अपनी जान गंवाती है तो उसकी पीड़ा कम गंभीर कैसे हो सकती है? आलोचकों का कहना है कि यह सीमा मनमानी और अन्यायपूर्ण है, जो कई पीड़िताओं को न्याय से वंचित कर देती है। यह एक गहरी नैतिक दुविधा है—कानून जहां सीमा खींच देता है, वहीं ज़िंदगी और मौत उस सीमा से परे भी घटित होती हैं।
निक्की भाटी का मामला केवल एक महिला की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि यह हमारे कानून की सीमाओं और समाज की वास्तविकता के बीच की खाई को उजागर करता है। सात साल की यह सीमा अब पुनर्विचार योग्य है। सवाल यह है कि क्या हमारे विधायकों और न्यायपालिका में इतनी संवेदनशीलता होगी कि वे इस कानूनी खामी को दूर करें और यह सुनिश्चित करें कि दहेज जैसी कुरीति की वजह से किसी भी महिला की मौत को “समयसीमा” में बांधकर न्याय से वंचित न किया जाए।