शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के हालिया सम्मेलन में तीन बड़े देश—भारत, चीन और रूस—ने एक मंच पर आकर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में बहुपक्षीय सहयोग (multilateralism) पर जोर दिया। इस बैठक को ऐसे समय में अहम माना जा रहा है जब दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक असंतुलन और ऊर्जा संकट लगातार बढ़ रहे हैं।
भारत का दृष्टिकोण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन में कहा कि SCO केवल एक क्षेत्रीय मंच नहीं है, बल्कि यह देशों को आपसी विश्वास और सहयोग के आधार पर जोड़ने का एक मजबूत प्लेटफ़ॉर्म है। भारत ने आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ के खिलाफ सामूहिक कदम उठाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। साथ ही मोदी ने यह भी स्पष्ट किया कि स्थायी शांति और विकास के लिए आपसी सम्मान और संप्रभुता की रक्षा ज़रूरी है।
चीन और रूस का संदेश
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सम्मेलन में आर्थिक सहयोग पर ज़ोर देते हुए कहा कि SCO देशों को साझा विकास परियोजनाओं, डिजिटल इनोवेशन और ऊर्जा सुरक्षा पर मिलकर काम करना चाहिए।
वहीं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिमी देशों पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधते हुए कहा कि “एकतरफा प्रतिबंध और दबाव की राजनीति” वैश्विक शांति और संतुलन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
सुरक्षा और आर्थिक सहयोग पर चर्चा
सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों ने सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने, सीमा-पार अपराधों से निपटने और साइबर सुरक्षा सहयोग पर भी चर्चा की। इसके अलावा, भारत और रूस ने द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने और स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन पर सहमति जताई। चीन ने भी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI)’ के तहत क्षेत्रीय परियोजनाओं में अधिक निवेश का आश्वासन दिया, हालांकि भारत ने इस पर अपनी पुरानी आपत्ति दोहराई।
भविष्य की दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि SCO सम्मेलन का यह चरण बेहद अहम है। भारत, चीन और रूस जैसे बड़े देशों का सहयोग न केवल एशिया बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक नया भू-राजनीतिक संतुलन बना सकता है। हालांकि, सदस्य देशों के बीच आपसी मतभेद भी कम नहीं हैं—जैसे भारत-चीन सीमा विवाद और रूस-यूक्रेन युद्ध का असर।
फिर भी, इस सम्मेलन ने एक बात साफ कर दी कि भारत, चीन और रूस अब भी बहुपक्षीय दुनिया की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं और साथ मिलकर आगे बढ़ने का संकेत दे रहे हैं